सोमवार, 8 अगस्त 2011

सपने…

इस फ़ोटो को देख कर कहीं पढ़ी हुई कुछ लाइनें याद आ गईं। अच्छी लगीं तो सोचा यहाँ ब्लॉग पर शेयर करूँ…


जो लहरों से आगे नज़र देख पाती तो तुम जान लेते मैं क्या सोचती हूँ
वो आवाज़ तुमको भी जो भेद जाती तो तुम जान लेते मैं क्या सोचती हूँ
ज़िद का तुम्हारे जो पर्दा सरकता तो खिड़कियों से आगे भी तुम देख पाते
आँखों से आदतों की जो पलकें हटाते तो तुम जान लेते मैं क्या सोचती हूँ।

मीठी-सी धुन वो तुम्हें क्यूँ बुलाती नहीं पास अपने, ड़ी सोचती हूँ;
थाम हाथ लहरें कहाँ ले चलेंगीरेत पर तुम्हारे खड़ी सोचती हूँ;
खोल खिड़कियाँ जब धूप गुदगुदाए, क्यूँ नींद में पड़े हो, क्या ख्वाब की कमी है?
अखबार और बेड-टी के पार भी है दुनियामैं रोज़ इन सवेरों में ड़ी सोचती हूँ

मेरी तरह खुद पर होता ज़रा भरोसा तो कुछ दूर तुम भी साथ साथ आते
रंग मेरी आंखों का बनते ज़रा सा तो कुछ दूर तुम भी साथ साथ आते
नशा आसमां का जो चूमता तुम्हें भी, हसरतें तुम्हारी नया जन्म पातीं
दूसरे जनम में मेरी उड़ान छूने कुछ दूर तुम भी साथ साथ आते।

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